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जैसे ही गाड़ी स्कूल के प्रांगण में पार्क करता एक चिड़िया मेरी गाड़ी के रेयर व्यू वाले दर्पण पर आती और उछल कूद करने लगती। वो उस दर्पण के पास ही रहती। कभी दर्पण के ऊपर बैठ कर दर्पण में झुक कर स्वयं को  देखती। बगल में पार्क हुई पीजीटी गणित श्री मति शालु मैंम की गाड़ी के शीशे पर भी उछल कूद करती हम सभी अध्यापक उसे देख कर बहुत खुश होते। मैंने कभी भी किसी भी पक्षी को उदास नही देखा है। शायद वो मजबूर है उन्हें सदा खुश रहना है चह चहाते रहना है। ये बात राजकीय उच्च विद्यालय समलहरी  पंचकूला की है। एक दिन हमारी इंग्लिश  विषय की पीजीटी श्रीमती गीता जी ने कहा कि  ये चिड़िया अपने आप को दर्पण में  देखने आती है। ये अध्यापक अब  यहां से स्थानांतरितहो चुके थे । कुछ दिनों बाद मैंने एक प्रयोग किया मैंने एक दिन ठीक अपनी गाड़ी के बोनट पर एक बड़ा दर्पण रख दिया परन्तु वो चिड़िया उस दर्पण की तरफ नही गयी। हमने गाड़ी  के दोनों  रेयर व्यू बन्द कर दिए पर चिड़िया वहीं रही। वो चिड़िया अपने मल से मेरी गाड़ी भी गन्दी कर देती पर मै फिर भी गाड़ी वहीं लगता था मुझे उस चिड़िया को देख कर एक अलग से आनंद की अनुभूति होती। अब बात करे  कि क्या वो चिड़िया अपने आप को देखने आती थी या यूं ही आती विज्ञान क्या कहता है। मैंने विज्ञान के आधार पर कुछ जानकारियां एकत्रित की वो आज आपके साथ सांझा करने जा रहा हूँ।


दर्पण और जीव (Mirror and Animals)

हम सुबह सुबह नहाने के बाद पहला काम होता है दर्पण के सामने खड़े होकर अपने आप को बाल सवारना। क्या पक्षी या जानवर भी हमारी तरह दर्पण में अपने आप को पहचान सकते है। ये पहेली आम इंसान के मन में सदा बनी रहती है। सन 1970 में वैज्ञानिक गॉर्डोन गलप जु. ने इस संदर्भ एक परीक्षण की खोज की।  उसका परीक्षण का नाम रखा MSR (MIRROR SELF RECOGNIZATION TEST) सर ने एक चिंपांज़ी के कान तथा भौहें पर लाल रंग की अल्कोहल घुलनशील डाई लगा दी ये डाई सूखने पर भी कोई गंध नही करती थी। अब उस चिंपांज़ी को वापिस अपने जंगले में भेज दिया गया और अगले तीस मिनट तक असकी गतिविधियों पर नज़र रखी गयी। अब उसके पिंजरे में एक दर्पण रखा गया।और अगले 30 मिनट उसकी गतिविधियों पर नज़र रखी गयी ये पाया गया कि जब उसके सामने दर्पण रखा गया तब उसने अपने कान व भौंहों को पहले के मुकाबले 4  से दस गुना अधिक बार छुआ। इससे ये निष्कर्ष निकाला गया कि जानवर की खुद को दर्पण में पहचानने की क्षमता होती है। यही प्रयोग किडियों (अकेशरूकी जीवोँ) पर भी किया नतीजा वही आया। ये भी देखा गया कि अपने को दर्पण में पहचानने की क्षमता भी आयु बढ़ने के साथ आती है। 

पक्षियों में  मैगपाई (पिका पिका ) नाम का पक्षी ही इस टेस्ट को पास कर पाया। गोरिला, कुत्ते, और बन्दर इस टेस्ट में फैल हो गए। बन्दर, कुत्तो ने तो एक अलग ही तरीके से  व्यवहार किया। वो बहुत ही उतेजक हो गए। वास्तव में दर्पण में अपने आप को पहचानना एक जटिल प्रक्रिया है। ये  मस्तिष्क के Neocortex भाग का कार्य है। नेयोकॉर्टेक्स भाग स्तनपायी जीवो में पाया जाता है पक्षियों में नही पाया जाता है फिर भी पिका पिका पक्षी ने ये टेस्ट पास किया।

डायना रईस जो कि एक पशु मनोवैज्ञानिक है जिनकी ' डॉलफिन इन मिरर ' बहुत ही विख्यात पुस्तक है कहती है कि अपने आप को दर्पण में पहचनाना एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। ये प्रकिया चरणों में होती है इसमें एक चरण को उन्हीने नाम दिया ग्रूचो चरण इस चरण में जानवर बहुत से उल्टे सीधे प्रक्रम करता है जिसे वह दर्पण में हो रही गतिविधियों से जोड़ता है। एक इंसानी बच्चा भी 18 महीने की आयु में दर्पण में स्वयं को पहचान पाने में सक्षम होता है। मेरी बेटियां अभी 14 महीने की है वो ड्रेसिंग टेबल के आगे पड़ी वस्तुओं से खेलती है पर वो दर्पण में आपने आप को पहचान पाने में असमर्थ है। जब वो 18 महीने की हो जाएगी तो वो भी अपने आप को दर्पण में पहचानने लगेगी। मुझे उसी दिन का बड़ी उत्सुकता से इंतज़ार है।


सुनील अरोरा (पीजीटी रसायन विज्ञान)
सार्थक र आ व म व सेक्टर 12 अ
पंचकूला (हरियाणा)